राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि गांवों में भारत बसता है, लेकिन आधुनिकता के इस युग में भारत शहरों में और गांवों में सिर्फ विरानियत बसती है. घनसाली का दूरस्थ सेमल्थ गांव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
राजशाही के समय अपनी समृद्धि और खुशहाली से अलग पहचान रखने वाला सेमल्थ गांव में आज पूरी तरह से पलायन हो चुका है और गांव में बचे हैं तो खंडहर और मकानों में लटके ताले.
बड़े-बडे मकानों और कृषि भूमि से इस गांव की समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आज ये गांव विरान हो चुका है.
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राजशाही के समय अपनी समृद्धि और खुशहाली से अलग पहचान रखने वाला सेमल्थ गांव में आज पूरी तरह से पलायन हो चुका है और गांव में बचे हैं तो खंडहर और मकानों में लटके ताले.
बड़े बड़े मकान तो हैं, लेकिन उनमें रहने वाला कोई नहीं जिस कारण कई मकान तो खंडहर में तब्दील हो चुके हैं और जो बचे हैं उनमें ताला लटका है. करीब 150 परिवारों में से सेमल्थ गांव में अब सिर्फ 20 से 25 परिवार ही बचे हैं, जिसमें बुजुर्ग लोग ही शामिल हैं.
बेरोजगारी और अन्य सुविधाओं के अभाव के चलते आज गांव में एक भी नौजवान नहीं रहा. ईटीवी की टीम जब सेमल्थ गांव पहुंची तो ग्रामीणों का गुस्सा झलक उठा. बुजुर्ग ग्रामीण महिला सरोजनी देवी का कहना है कि सड़क नहीं होने के चलते गांव खाली हो गया है और आज तक कोई नेता अधिकारी या मीडिया गांव में नहीं पहुंचा है.
जिला पंचायत की ओर से 13 अगस्त 1994 में स्वीकृत 7.5 किलोमीटर जखन्याली- सेमल्थ-ढाबसौड़ सड़क का आज तक निर्माण नहीं हो पाया है. विभागीय लापरवाही से आज तक करीब ढाई किलोमीटर सड़क ही बन पाई है. जिस कारण ग्रामीणों को करीब 5 किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता है.
गांव में बचे कुचे परिवारों में से एक परिवार की घसियाल बिमला देवी का भी कहना है कि आज तक उनकी सुध लेने कोई यहां नहीं पहुंचा और अब वो लोग भी गांव छोड़ने की सोच रहे हैं.
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